खामोशी की चादर में ख़ुद को समेटे हुए
हर एक बीते पल को जिस्म से लपेटे हुए
लगता है जैसे हर एक पल में जी ली सदी
क्या करू मैं जब तू याद आए सोते हुए
माँगा तो नही था मैं कुछ भी कभी तुमसे
ख़ुद भरते गए मेरी दामन खुशियों से
फ़िर छोड़ दिए मझधार में लाकर
फ़िर भी शिकवा नही मुझे तुमसे और ज़माने से
कुछ तो थाती छोड़ी आपने मेरे लिए
भले ही ये मोतियें आँखों में ही सही
ऐसा तो नही की आप मुझे याद ना करते हो
जान बुझ के नही तो अनजाने से ही सही
कौन रहेगा सदा यहाँ
हम सभी दो पल के राही है
भले ही कुछ पल गुजरे हो साथ में
वो मेरे लिए काफी है
हर एक बीते पल को जिस्म से लपेटे हुए
लगता है जैसे हर एक पल में जी ली सदी
क्या करू मैं जब तू याद आए सोते हुए
माँगा तो नही था मैं कुछ भी कभी तुमसे
ख़ुद भरते गए मेरी दामन खुशियों से
फ़िर छोड़ दिए मझधार में लाकर
फ़िर भी शिकवा नही मुझे तुमसे और ज़माने से
कुछ तो थाती छोड़ी आपने मेरे लिए
भले ही ये मोतियें आँखों में ही सही
ऐसा तो नही की आप मुझे याद ना करते हो
जान बुझ के नही तो अनजाने से ही सही
कौन रहेगा सदा यहाँ
हम सभी दो पल के राही है
भले ही कुछ पल गुजरे हो साथ में
वो मेरे लिए काफी है
3 comments:
liye chalte ho kiske liye
zakhm zamaane bhar ke
kya karoge samet kar itna
dard khazaane bhar ke
wah kya baat hai...right from ur heart...
Bahut Accha dost..I m going to read all ur posts today..just continue poasting like this..
Post a Comment