Sunday, December 28, 2008

भले ही कुछ पल गुजरे हो साथ में

खामोशी की चादर में ख़ुद को समेटे हुए
हर एक बीते पल को जिस्म से लपेटे हुए
लगता है जैसे हर एक पल में जी ली सदी
क्या करू मैं जब तू याद आए सोते हुए

माँगा तो नही था मैं कुछ भी कभी तुमसे
ख़ुद भरते गए मेरी दामन खुशियों से
फ़िर छोड़ दिए मझधार में लाकर
फ़िर भी शिकवा नही मुझे तुमसे और ज़माने से

कुछ तो थाती छोड़ी आपने मेरे लिए
भले ही ये मोतियें आँखों में ही सही
ऐसा तो नही की आप मुझे याद ना करते हो
जान बुझ के नही तो अनजाने से ही सही

कौन रहेगा सदा यहाँ
हम सभी दो पल के राही है
भले ही कुछ पल गुजरे हो साथ में
वो मेरे लिए काफी है

3 comments:

Anonymous said...

liye chalte ho kiske liye
zakhm zamaane bhar ke
kya karoge samet kar itna
dard khazaane bhar ke

Unknown said...

wah kya baat hai...right from ur heart...

Mrinal Sonal said...

Bahut Accha dost..I m going to read all ur posts today..just continue poasting like this..