बिखरे हुए सपने क्या फ़िर से नहीं सजा सकते ,
ईक बार टूट गया दिल तो क्या मरहम नहीं लगा सकते .
परवाना को तो कभी रोकती नहीं बुझती शमा ,
क्या हम बुझती शमा को फ़िर से नहीं जला सकते .
अगर बहते हैं आँसु उन आँखों से ,
क्या उसे हम उसे अपना नहीं बना सकते .
नहीं चाहिए मुझे ज़माने भर की खुशियाँ ,
क्या दो पल भी आपका साथ नहीं पा सकते .
परवाना को तो कभी रोकती नहीं बुझती शमा ,
क्या हम बुझती शमा को फ़िर से नहीं जला सकते .
अगर बहते हैं आँसु उन आँखों से ,
क्या उसे हम उसे अपना नहीं बना सकते .
नहीं चाहिए मुझे ज़माने भर की खुशियाँ ,
क्या दो पल भी आपका साथ नहीं पा सकते .
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