दर्द को शब्दों मे समेटा, तो गजल बन गए ।
आंसुओं को हथेली मे समेटा ,तो महल बन गए।
गम को भुलाने चला मयखाने मे,
तो मय हमसफ़र बन गए।
तमन्ना थी तेरे साथ चलने की ,
अब कांटे भी मेरे रहगुजर बन गए।
मुझे परवाह नही थी ज़माने की ,
पता नहीं वो मुझे देखते ही क्यों पत्थर बन गए।
हसरत थी वे खुश रहे हरदम ,
पता नही मेरी दुआएं क्यों बेअसर बन गए।
Friday, February 29, 2008
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